जेल में सजायाफ्ता कैदियों में शिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन 

 

डाॅ.हर्षा पाटिल1, डाॅ.अब्दुल सत्तार2, नंद किषोर सिंह3

1सहायक प्राध्यापिका, कंिलंगा विष्विद्यालय, नया रायपुर.

2विभागाध्यक्ष, कमला नेहरू महाविद्यालय, कोरबा.

3शोधार्थी, कंिलंगा विश्वविद्यालय, नया रायपुर.

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की ध्ूारी है जिस पर उसके विकास का चक्र घूमता है राष्ट्र जनों मानसिक क्षितिज का विस्तार देकर उन्हें प्रत्येक क्षेत्र में कार्य सक्षम बनाना षिक्षा का उपहार है। षिक्षा को मानवीय जीवन का ज्योर्तिमय पक्ष माना है, जिससे मानव के व्यक्तित्व का चर्तुमुखी विकास होता है। षिक्षा मानव के बौद्धिक तथा सामाजिक विकास में जन्म से चल रही प्रक्रिया है। मानव जन्म से लेकर मृत्यु तक जो कुछ सीखता है या करता है वह षिक्षा के माध्यम से ही करता है। प्राचीन काल में षिक्षा को तो पुस्तकीय ज्ञान का पर्यायवाची माना गया और ही जीवकोपार्जन का साधन है वरन् षिक्षा को वह प्रकाष माना गया है,जो व्यक्ति को उत्तम जीवन व्यतीत करने मोक्ष प्राप्त करने का साधन माना है।

 

KEYWORDS:  जेल, कैदी, शिक्षा।

 


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शिक्षा किसी भी राष्ट्र की ध्ूारी है जिस पर उसके विकास का चक्र घूमता है राष्ट्र जनों मानसिक क्षितिज का विस्तार देकर उन्हें प्रत्येक क्षेत्र में कार्य सक्षम बनाना षिक्षा का उपहार है। षिक्षा को मानवीय जीवन का ज्योर्तिमय पक्ष माना है,जिससे मानव के व्यक्तित्व का चर्तुमुखी विकास होता है। षिक्षा मानव के बौद्धिक तथा सामाजिक विकास में जन्म से चल रही प्रक्रिया है।

 

मानव जन्म से लेकर मृत्यु तक जो कुछ सीखता है या करता है वह षिक्षा के माध्यम से ही करता है। प्राचीन काल में षिक्षा को तो पुस्तकीय ज्ञान का पर्यायवाची माना गया और ही जीवकोपार्जन का साधन है वरन् षिक्षा को वह प्रकाष माना गया है,जो व्यक्ति को उत्तम जीवन व्यतीत करने मोक्ष प्राप्त करने का साधन माना है।

 

षिक्षा षब्द का अर्थ विद्या अथवा ज्ञान की प्राप्ति है। इस षब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘‘षिक्ष्’’ धातु से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ सिखाना है। चूकी मुनष्य के सीखने की प्रक्रिया जीवन भर जारी रहती है, इसलिए व्यापक अर्थों में कहा जाता है -शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा के तीन महत्वपूर्ण घटक होते हैं। व्यक्ति, वातावरण एव समय व्यक्ति सर्वप्रमुख घटक हैं, क्योंकि वहीं षिक्षा ग्रहण करता है। व्यक्ति के बाद वातावरण षिक्षा का ऐसा घटक है, जिसका प्रभाव व्यक्ति के षिक्षा प्रक्रिया पर होता है। समय के अनुसार षिक्षा के उद्देश्य में परिवर्तन होता है। इसलिए समय भी षिक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक होता है। इन तीनों घटकों के अतिरिक्त व्यक्ति का वंषानुक्रम भी षिक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है,क्योंकि व्यक्ति में जो जन्म जात संस्कार होते हैं,उस पर उसके वंषानुक्रम का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है।

 

किसी भी राष्ट्र के विकास में षिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान होता है। वह राष्ट्र के लोगो को एक मार्गदर्षन प्रदान करती है। वास्तव में हम षिक्षा से ही अपने ज्ञान को बढ़ाते है और यही ज्ञान हमारा तीसरा नेत्र होता है। जो हमे सभी समस्यायो को समझकर उसे हल करने में निपुण बनाता है। समाज में अपराध पहले से ही होते रहे है। समाज में जो भी अपराध हो रहे है, उसके पीछे समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण ही जिम्मेदार है। षिक्षा की कमी ही अपराध का मूल कारण है। अपराध की प्रवृति किसी भी आयु सीमा के लोगो में पायी जाती है। अपराधी की कोई आयु सीमा नहीं होती है। अपराध एक गलत कार्य है और इसके लिये अपराधी को सजा दी जाती है।

 

आज आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद भी हमारी भावना सुखमय जीवन व्यतीत करने की रही है। लेकिन आज भी बेरोजगारी, स्वास्थ्य आवास भोजन से समबन्धित समस्याये चारो और व्याप्त है। इसका कारण ही है। आज आर्थिक विपन्नता के कारण लोग झुग्गी-झोपड़ी में रहने को बाध्य है। यही से अपराधी प्रवृति के लोग पनपते है। ज्यादातर यह रहने वाले लोग अषिक्षित होते है और अपराध को जन्म देते है। इनका समाज विपन्नतापूर्ण होता है। राजनीतिक दल भी इनके उन्नयन के लिये कोई ठोस कदम नहीं उठाते है। गरीबी और बेरोजगारी के कारण ये लोग अपराध करते है; जो आज के समाज की ज्वलंत समस्या है।

 

वर्तमान समय में यह सर्वविक्षित है, कि षिक्षा के द्वारा ही मनुष्य एवं उसके समाज का विकास किया जाता है। षिक्षा के आभाव में समाज का विकास किया जाता है। षिक्षा के अभाव में समाज और उसमें रहने वाले लोगों का विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है। वास्तव में इस संसार में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो ज्ञान प्राप्त करता है। इसके अभाव में मानव पशु के समान होता है। षिक्षा के द्वारा मनुष्य को अनुशासित किया जाता है। यही ज्ञान उसे भविष्य में विभिन्न कठिनाई के योग्य बनाती है इससे उसके विकास का मार्ग प्रषस्त होता है अपने और दुसरो के ज्ञान को समझकर स्व निर्णय की क्षमता को बढ़ाता है। सांसारिक क्रियाओं का सुक्ष्म और व्यापक दार्षनिक अध्ययन एवं उचित, अनुचित के विचार का विष्लेषण मानव षिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कर पाता है।

 

उचित षिक्षा के अभाव में की मानव गलत कार्य करता है,क्योंकि उसे अपने द्वारा किये गये कार्य के परिणाम के बारे में सही जानकारी नहीं होती देष में षिक्षा की दर को और बढ़ाने के लिये कई कदम उठाये गये है जिससे सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःषुल्क षिक्षा दी जाय। मगर फिर भी कई कारणों से बच्चों तक षिक्षा की रोषनी नहीं पहंुच पाती है। इसका परिणाम यह होता है कि वे गलत मार्ग अपना लेते है। अतः आज समाज में जो अपराध हो रहे है,उसे रोकने के लिये लोगों को षिक्षा देना अनिवार्य हो गया है। अपराधियों में षिक्षा के द्वारा मानवीय गुणों और मुल्यों का विकास किया जा सकता है।

 

अपराध वह क्रिया है,जिसे राज्य ने सामुहिक कल्याण के लिये हानिकारक घोषित किया है। वर्तमान समय में समाज का स्वरूप बदल रहा है। आज अपराधी की कोई आयु सीमा नहीं होती है। हमें अपराधियों को ऐसी षिक्षा प्रदान करनी चाहिये जिसके द्वारा वे पुनः समाज में जाकर सामजस्य स्थापित कर पायें। षिक्षा के द्वारा उसके उचित चरित्र का निमार्ण किया जा सके। व्यक्ति जब वह किसी विषेष परिस्थिति में वह समाज के मूल्य और उनके उद्देष्य की अवहेलना करता है तो वह अपराध ये शामिल हो जाता है व्यक्ति कि कारणों से अपराध कर रहा है,उसके षिक्षा का स्तर क्या है और इनके जीवन में षिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन करना जिससे इनकी अपराधी मनोदषा को समझा जा सके। समस्या का सूक्ष्म अध्ययन कर उन कारणों का पता लगाया जा सकें और जिससे इन अवरोधों को दूर कर जेल में सजायातता कैदियों षिक्षा की समस्या को दूर कर जेल में सजायातता कैदियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अतः उक्त बातें अध्ययन की आवश्यकता को व्यक्त करता है।

 

बन्दी गृह से तात्पर्य:-

प्राचीन काल में अपराधियों को अन्धेरी कोठरियों में बंद करके कठोरतम दण्ड दिया जाता था किन्तु आज बंदी गृह में कैदियों के साथ मनुष्यता का व्यवहार एवं आवश्यकतानुसार उनका उपचार किया जाता है। जिसमें अनेक प्रकार के प्रषिक्षण भी सम्मिलित हैं जो कैदियों केा मुक्ति के पश्चात उनकी भरण-पोषण की समस्या के समाधान में सहायक होता है। बन्दी गृह एक दण्ड संस्था हैं, जिसका संचालन राज्य या संघ सरकार करती है और जिसका उपयोग अपराधियों के लिए होती है, जिन्हें सजा मिलती है।

 

कारागार के उद्देष्य:-

कारागार के निम्न उद्देष्य प्रस्तुत किए हैं-

प्रथमत: -वर्तमान समाज सुधार पुनर्वासन एवं अपराधियों के उपचार पर विषेष बल देकर अपराधियों की अपराधिक मनोवृत्तियों में परिवर्तन लाना चाहता है ताकि वे समाज में पुनः अपराध करें। कारागार से अपराधियों के सुधार अथवा पुर्नवासन की अपेक्षा की जाती हैै।

 

द्वितीयत: - समाज अपराधियों से सुरक्षित रहना चाहता है। कारागार अपराधियों को सामान्य समाज से पृथक कर देता है, ताकि कुछ निष्चित समय के दौरान वे अपराध नहीं कर सकें।

 

तृतीयत: - समाज प्रतिषोध चाहता है। कारागार से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्ति जो अपने अपराधों से दूसरे व्यक्तियों का जीवन दुःखद बना देते हैं, ऐसे व्यक्तियों का जीवन दुःखद बना दें। इस प्रकार समाज बदले की भावना के कारण अपराधियों को कारागार की चार दीवारी के भीतर रखना चाहता है। इस प्रकार समाज अपराधियों को सामान्य समाज से पृथक रखना चाहता है।

 

रूचि की अर्थ एवं परिभाषा:-

हमारी जन्मजात प्रवृŸिायां ही हमारी विषिष्ट रूचियां के लिये Ÿारदायी है। वस्तुतः हम उन्ही चीजो के प्रति रूचि रखते है, जिससे हमारी जन्मजात ईच्छाये संतुष्ट होती जाती है। इसके अतिरिक्त जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते है हमारी मूल प्रवृŸिायों कई प्रकार की भावनाओ और जटिलताओ को जन्म देने लगती है। जिनसे हमारे जीवन में कई प्रकार के आदर्ष और लक्ष्य स्थापित हो जाते है। अतः रूचियो को केवल जन्मजात समझना भ्रममूलक धारणा है। ये अर्जित होती है और मूल प्रवृŸिायों तथा वातावरण की विषिष्ट षक्तियो के सतत् संघर्ष से ही इनका विकास होता है।

 

रास के अनुसार -

‘‘जो वस्तु हमसे सम्बन्धित, होती है अथवा प्रयोजन रखती है, हमारी रूपि उसी में होती है।’’

 

क्रो एण्ड क्रो के अनुसार -

‘‘रूचि वह अभिप्रेरक शक्ति है जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देने के लिये बाध्य करती है।’’

 

छत्तीसगढ जेल विभाग द्वारा शैक्षिक सुधार कार्यक्रम निम्न प्रकार से चलाये जा रहे हैं:-

पुर्नवास हेतु जेल में संचालित गतिविधियाॅं-

आस्था प्रषिक्षण एवं सर्विसिंग केन्द्र

आस्था पेट्रोल पंप

औषधी निर्माण

साबुन उद्योग

बायोगैस संयंत्र, गैसीफायर संयंत्र प्रशिक्षण

वस्त्र दरी उद्योग

आफसेट प्रिंटिंग

आस्था गौषाला, मुंगौड़ी सेंटर

सिलाई, कम्प्यूटर, बढ़ई आदि।

 

इसके अतिरिक्त कारागारों में नियमित रूप से खेल-कूद, धार्मिक अनुष्ठान, राष्ट्रीय पर्व, धार्मिक पर्व को मनाने की और अंतिम रूप से प्रयास यह किया जा रहा है,कि कैदियों में मानवीय व्यवहार प्रदान किया जाए जिससे वह प्रतिषोधात्मक प्रकृति के व्यक्ति बनकर अच्छे उपयोगी नागरिक बन सके। वर्तमान समय में सजायतता कैदियांे के लिये भारत में षिक्षा की व्यवस्था की गयी है। इसके साथ-साथ कई प्रकार के प्रषिक्षण की भी व्यवस्था की गयी है। भारत में आाजादी के बाद यह नियम लागू किया गया कि यदि कोई कैदी ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उसके लिये न्यायालय व्यवस्था करता है। भारत की प्रथम महिला आई.पी.एस. श्रीमती किरण बेदी जो कि तिहाड़ जेल दिल्ली में महानिरीक्षक थी कैदियों को दिये कई व्यवस्था की। इसके पहले 1844 में पेन-सिल्वेनिया में ओर 1870 में डैटरियाड जले में कैदियों के लिये षिक्षा की व्यवस्था की गयी। जेल में संचालित षिक्षा की व्यवस्था एवं विभिन्न प्रषिक्षण से कैदी सजा काटने के बाद एक आत्मनिर्भर जीवन समाज में व्यतीत कर सकते है। 1898 में इग्लैण्ड में जेल अधिनियम पारित किया गया। इसमें दो महत्वपूर्ण अधिनियम पारित किये गये ये अधिनियम निम्नलिखित है-

1. अंग्रेजी बाल अधिनियम

2. अपराध निरोध अधिनियम

 

दुर्ग केन्द्रीय जेल में पुर्नवास हेतु निम्न गतिविधियां चलायी जाती है।  पिं्रटिग, गोषाला, मुगेड़ी सेंटर, कम्प्यूटर, वेल्डिग, सिलाई, खेती कार्य जैसे कार्य कैदियों को सिखाये जा रहे है इसके साथ -साथ कई तरह की गतिविधियां है,जैसे गीता पाठ, धार्मिक पर्व, आदि जिससे की वे अच्छे नागरिक बन सके

 

अपराध का अर्थ एवं परिभाषा:-

हर व्यक्ति अपने निजी जीवन में स्वतंत्रता एवं स्वच्छन्द रहना चाहता है। वह उसमें किसी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप नहीं चाहता। यदि कोई व्यक्ति उसमें हस्तक्षेप करता है तो ऐसे व्यक्ति को पीड़ा, क्लेष, अथवा हानि हो सकती हैै। चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, संपत्ति संबंधी हो या प्रतिष्ठा संबंधी। किसी भी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के निजी जीवन एवं अधिकरों में हस्तक्षेप नहंी करना चाहिए और ही ऐसा कोई कार्य करना चाहिए जिससे उसको शारीरिक अथवा मानसिक क्षति या पीड़ा पहुंचे। साथ ही उसे ऐसा कार्य के लिए तत्पर रहना चाहिए जो दूसरे व्यक्ति के अधिकारांे को न्यायोचित उपयोग-उपभोग के लिए आवश्यक हो। यदि कोई व्यक्ति इसके प्रतिकूल व्यवहार करता है तो यह कहा जाएगा कि उसने अपने कर्तव्यों का उचित निर्वाह नहंी किया है अर्थात् वह ‘‘कर्तव्य-भंग‘‘ का दोषी माना जाएगा। विधिक भाषा में इसे हीअपराधकी संज्ञा दे सकते है।

 

महात्मा गांधी- ‘‘अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं‘‘ कहने का अर्थ यह है कि हम अक्सर यह देखते हैं कि अगर कोई व्यक्ति जेल जाकर आया हो तो हम उस व्यक्ति हेय दृष्टि से देखते हैं और उसकी मनोदषा को जानने की कोषिष नहीं करते, जबकि हमें यह चाहिए कि उस स्थिति का कारण जानकर उसकी अपराधी प्रवृत्ति को दूर कर सके और उससे प्रेम पूर्वक संबंध रखें तभी यह संभव हैं।

कौटिल्य का कथन - ‘‘जब दण्ड का प्रयोग नहीं होता तब मतस्य न्याय की दषा उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि दण्डधर के अभाव में बलवान दुर्बल को खा डालता है।‘‘कानूनी दृष्टिकोण से देष के कानून का उल्लंघन करने के लिए न्यायालय द्वारा सिद्ध दोषी दण्डित व्यक्ति ही अपराधी होता है। वह व्यक्ति जो पुलिस के द्वारा पकड़ा गया हो लेकिन न्यायालय द्वारा छोड़ दिया जाता है, को अपराधी नहीं कहा जा सकता अर्थात उस व्यक्ति के लिए कतनीकी दृष्टि सेअपराधीशब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता जिसको अपराध के लिए दण्डित नहीं किया गया है।

 

अपराध के कारण -

सामाजिक समस्या के रूप में अपराध में वृद्धि होती हुई जान पड़ती है। यह वृद्धि कुछ तो जनसंख्या की सामान्य वृद्धि के परिणाम स्वरूप और कुछ तो जनसंख्या के अधिक भाग के ग्रामीण वातावरण के बजाय शहरी वातावरण में रहने के परिणामस्वरूप हो रही है। हम इस वृद्धि की व्याख्या अपराध के कारणों के आधार पर ही कर सकते हैं। ये कारण निम्नलिखित हैं:-

 

आनुवांषिक कारण

शारीरिक कारण

मनोवैज्ञानिक कारण

सामाजिक कारण

पारिवारिक कारण

विद्यालय संबंधी कारण

संवाद-वाहन के साधन या संचार साधन

सांस्कृतिक कारण

आर्थिक कारण

 

अध्ययन का महत्व:-

आज विष्व के समस्त देष अपने यहाॅ बढ रहे अपराध से ग्रसित हैं, क्योंकि अपराधियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है तथा अपराध की समस्या को और अधिक भयानक बना देता हैं। इस समस्या पर विषेेष ध्यान दे रहे हैं और अपराध की ओर प्रवृत्त करने में उत्तरदायी कारकों की खोज विश्लेषण किया जा रहा हैं। ऐसा कोई भी समाज का नही है जहां अपराध नहीं होते है। अपराध और समाज का संबंध चोली -दामन का है जो साथ-साथ चलते रहते है। इतना जरूर है,कि अपराध के कारण सभी जगह एक समान नहीं होते है। यही कारण है कि अपराध का स्चरूव समय के साथ -साथ बदलते रहता है। समाज में षांति बनी रहे इसके लिये पुलिस जैसे दल का गठन किया गया  है। पुलिस उसका विरोध करती है। इनकी सुनवाई न्यायालय में होता है और दोषी पाये जाने पर इन्हें जेल में रखा जाता है। परन्तु पहले की भांति इन जेलों में कैदियों के साथ व्यवहार नहीं किया जाता है, पहले जो जेल थे,उनका स्वरूप अब बदल चुका है।जेल में कैदियों को सुधारा जाता है, उन्हें कई तरह के व्यवसायिक प्रषिक्षण दिये जा रहे है, जेल में प्रषिक्षण प्राप्त करने के बाद ये लोग कैदियों को जो प्रषिक्षण इन्हें मिला है,उससे संबंधित व्यवसाय प्रांरभ कर सके और अपने आप को स्वावलबी बना सके

 

अपराध की रोकथाम का उचित माध्यम षिक्षा ही हो सकता है। षिक्षा के माध्यम से कैदियों के आंतरिक एवं बाह्य गुणों का विकास आसानी से किया जा सकता है। षिक्षा मानव को व्यक्तित्व का विकास करती हैं, षिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया हैं,जिसके द्वारा व्यक्ति अपनी गलत आचरणों को सुधार सकता हैं या कह सकता है कि षिक्षा देेने वाला गुरू उस कुम्हार की भाॅंति होता है,जो विद्याग्रही को मनचाहे आकारों मे ढालना चाहे ढाल सकते हैं अर्थात् कैदियों षिक्षा के द्वारा सुधार किया जा सकता है और नवीन गुणों का विकास कर सकते है:-कैदियों के मानसिक गुणो का विकास करना,कैदियों में शारीरिक गुणों का विकास करना, कैदियों को आत्मनिर्भर बनाना,कैदियों हेतु रोजगार अवसरों में वृद्धि करना,कैदियों का सामाजिक आर्थिक स्थितियों में सुधार लाना,कैदियों में सामाजिक वातावरण में समायोजन करने में सहयोग करना। अपराधी को अपराध की सजा दी जाती है, एक निष्चित अवधि के लिये, मगर वर्तमान समय में जो भी कारागार है, वहां अपराधियों को प्रषिक्षित किया जा रहा है और ऐसे गुण कार्य सिखाये जा रहे है,जिससे वे बाहर जाकर आत्मनिर्भर बन सके। अतः उक्त बातें अध्ययन की महत्व को व्यक्त करता है।

 

पूर्व मे किये गए षोध कार्य:-

किसी भी अध्ययन के चयन के पष्चात् यह आवश्यक हो जाता है कि समस्याओं से सम्बधित तथ्यो पर पूर्व में जो संबंधित षोध किये गये है, उनके निष्कर्षो का प्रयोग अपने शोध के विषय में समस्या के समाधान के लिये किय जाय।

 

कुमारी रमा साहू ने रायपुर नगर में अपराध एक भौगोलिक अध्ययन में पाया कि-रायपुर में वर्ष 1998 में अपराध में वृद्धि हुई है,जिसका मुख्य कारण जनसंख्या में वृद्धि, गरीबी है। रायपुर शहर में अपराध के लिए सामाजिक, आर्थिक राजनैतिक कारण के साथ-साथ धार्मिक कारण भी आंषिक रूप से प्रभावित करता है।

 

कुमारी संयोगिता चन्द्राकर ने 1997-98 में दुर्ग में होने वाले अपराध का भौगोलिक अध्ययन किया और पाया कि दुर्ग जिले में भारतीय दण्ड संहिता के सभी अपराध मिलते है।आयु के आधार पर दुर्ग जिले 18-30 वर्ष वाले आयु के लोग अपराध में अधिक लिप्त मिले है। इनका प्रतिषत 75 है। द्वितीय स्थान पर 30-35 वर्ष आयु समूह के लोग है।

 

राधा विष्ट (2009-2010)ने ‘‘बाल-अपराधी बालको में षिक्षा के महत्व का अध्ययन कर पाया किबाल अपराधियो में षिक्षा प्रदान करने से उनके जीवन पर उचित प्रभाव पड़ता है।बाल अपराधियो को रोजगार के लिए लघु उद्योग की षिक्षा प्रदान की जाती है ताकि उन्हे समाज में रोजगार प्राप्त हो सके।बालक अपराधी स्वयं मानते है कि उन्हे षिक्षा की आवश्यकता है।बाल अपराधियो को शासन द्वारा षिक्षा की व्यवस्था कर उन्हे षिक्षित कर समाज में समायोजन के लायक बनाया जाता है,ताकि समाज को सुधारने में अपना सम्पूर्ण योगदान दे सके।

 

भट्ट और कडके (1990) ने महानगरीय बाम्बे के 40 एवं 20 नगर का द्वितीय स्त्रोत के माध्यम से वैज्ञानिक अध्ययन किया ओर पाया की- औद्योगिक दो जगह पर धनी बस्तियाँ है वहाँ पर हत्या, चाकूबाजी और दुसरो को नुकसान पहुचाने वाले अपराध ज्यादा पाये गये। सम्पŸिा पर आक्रमण जेसे चोरी, डकैति, ताला तोड़ना जेसे अपराध रिहायसी इलाको में हुये। सामाजिक आर्थिक कारक गरीबी, अपराध को बढ़ावा देने के लिये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।  परिवारिक जीवन षिक्षा:-‘‘कैदियो के पुर्नवास के लिये प्रभावषाली उपकरण है।’’यह अध्ययन यह जाॅंच करती है,कि कैदियों में किस तरह पारिवारिक जीवन षिक्षा कार्यक्रम प्रभावषाली है।

 

अध्ययन का उद्देष्य:- प्रस्तुत अध्ययन के निम्नलिखित उद्देष्यों का निर्माण किया गया है -

कैदियों में षिक्षा के स्तर का अध्ययन करना।

कैदियों में पारिवारिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना।

कैदियों में षैक्षिक वातावरण का अध्ययन करना।

कैदियों में रोजगार के प्रभाव का अध्ययन करना।

 

अध्ययन की परिकल्पना:-प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाएँ निर्मित की है-

परिकल्पना एच1-  कैदियों में षिक्षा का स्तर निम्न पाया जायेगा।

परिकल्पना एच2 - कैदियो की परिवारिक पृष्ठभूमि निम्न पायी जायेगी।

परिकल्पना एच3- कैदियो में शैक्षिक वातावरण का स्तर निम्न पाया जायेगा।

परिकल्पना एच4 -जेल में कैदियो को रोजगार के लिये प्रोत्साहित किया जायेगा।

 

अध्ययन की परिसीमा:-

प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने परिसीमन निम्न प्रकार से किया है -

प्रस्तुत षोध दुर्ग जिले में स्थित केन्द्रीय जेल दुर्ग को लिया गया है।

इस अध्ययन में 100 कैदियो को लिया गया हैं,जिसमें उनके षैक्षिक रूचि का अध्ययन किया गया है।

प्रस्तुत अध्ययन के अन्तर्गत जेल में सजायातता कैदियो में षिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन संबंधित जानकारी ली गई है।

प्रस्तुत अध्ययन हेतु शोधकर्ता द्वारा साक्षात्कार अनुसूची के निर्माण के लिए ने अपने शोध निर्देषक से मार्गदर्शन प्राप्त किया किया गया है।

 

षोध प्रविधि:-

प्रस्तुत षोध प्रबंध जेल में सजायातता कैदियों में षिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन के उददेष्यों की पूर्ति के लिए सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है।

जनसंख्या: -

जनसंख्या हेतु दुर्ग जिले के अंतर्गत् दुर्ग केंद्रीय जेल का चयन किया गया है। जिसमें जनसंख्या के लिए 1467 जेल में सजायातता कैदियो को शामिल किया गया है।

 

न्यादर्श:-

प्रस्तुत शोध के उदेदष्य की पूर्ति के लिए दुर्ग जिले के अंतर्गत् दुर्ग केंद्रीय जेल में सजायातता कैदियांे का चयन किया गया है। शोध अध्ययन हेतु दुर्ग जिले के अंतर्गत् दुर्ग केंद्रीय जेल में सजायातता कैदियांे का चयन दैवनिदर्षन विधि से किया गया है। इनमें से प्राप्त परिणाम समग्र का पूर्णतः प्रतिनिधित्व करेगंे।

 

तालिका क्रमांक 1.1 यादर्ष के अतंर्गत जेल में सजायातता कैदियों की संख्या

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उपकरण:-

प्रस्तुत षोध प्रबंध में शोधकर्ता द्वारा स्वयं निर्मित उपकरण साक्षात्कार-अनुसूची का प्रयोग किया गया है।

 

सांख्यिकीय विष्लेषण:-

जेल में सजायातता कैदियो में षिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन (दुर्ग केन्द्रीय जेल के विषेष सन्दर्भ में)से संबंधित स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का निर्माण किया गया है। जिसमें अधिकतर (हां/नहीं) वस्तुनिष्ठ प्रष्न हैं। इसके लिए संकलित प्रदत्तों को सारणीकृत निकाला गया। प्रदत्तों द्वारा प्राप्त आंकड़ों का योग कर प्रतिषत निकाला गया। प्रतिषत के माध्यम से जेल में सजायातता कैदियों में षिक्षा के प्रति रूचि का अध्ययन किया गया।

 

निष्कर्ष:-

1. अध्ययन के निष्कर्ष से प्राप्त होता है,उपरोक्त सारणी से स्पष्ट होता है, कि100 प्रतिषत उत्तरदाताओं में से 69 प्रतिषत उत्तरदाता षिक्षित हैं, जबकि 31 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने कहा वे अषिक्षित हैं, लेकिन अब उनके जेल में षिक्षा दिया जा रहा है। 49 प्रतिषत उत्तरदाताओं को उनके पिता उन्हें नहीं पढाते क्योंकि उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, 65 प्रतिषत उत्तरदाताओं के परिवार के सभी सदस्य षिक्षित हैं। 70 प्रतिषत उत्तरदाताओं को विद्यालय में पढ़ने में मन लगता था, 66 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घर की महिलाऐं भी षिक्षित हैं, जबकि 34 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घर की महिला अषिक्षित हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति कारण है। अतः परिकल्पना अस्वीकृत होती हैेे।

 

2. अध्ययन के निष्कर्ष से प्राप्त होता है,कुल 100 प्रतिषत उत्तरदाताओं में से 45 प्रतिषत कैदियों के पिता मजदूरी, 20 प्रतिषत व्यवसाय, 12 प्रतिशत नौकरी तथा 23 प्रतिषत अन्य कार्य करते हैं। 64 प्रतिषत उत्तरदाताओं के पिता की आय से घर चलता है। 42 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने कहा उनकी आमदनी कम होने से घर खर्च नहीं चल पाता। 64 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घरों में अन्य सदस्य कार्य करते हैं, जबकि 36 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घरों में अन्य सदस्य कार्य नहीं करते हैं क्योंकि वे पढ़ रहे हैं या रोजगार के अवसर की तलाष में हैं। 31 प्रतिषत उत्तरदाताओं के पिता नषा नहीं करते हैं। जबकि 18 प्रतिषत कैदियों के पिता नषा करते हैं। 75 प्रतिषत कैदियों के पिता नषे की हालत में घर पर नहीं आते हैं। 25 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने कहा कि पिता नषे की हालत में घर पर आते हैं। 84 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घर में कलह नहीं होते क्योंकि उनके माता-पिता नषा नहीं करते। 16 प्रतिषत उत्तरदाताओं के घर में कलह होते हैं और उसका कारण नषा है। अतः परिकल्पना एच2 - पारिवारिक पृष्ठभूमि से संबंधी प्रष्न अस्वीकृत होती है।

 

3. अध्ययन के निष्कर्ष से प्राप्त होता है, उपरोक्त सारणी से स्पष्ट होता है,कि 100 प्रतिषत उत्तरदाताओं में से 73 प्रतिषत उत्तरदाताओं की पढ़ाई में रूचि है जबकि 27 प्रतिषत उत्तरदाताओं की पढ़ाई में रूचि नहीं है। क्यांेकि उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता। 87 प्रतिषत उत्तरदाताओं के आस-पड़ोस में षिक्षा का अच्छा वातावरण है। 83 प्रतिषत उत्तरदाताओं के आस-पड़ोस के लोग षिक्षित हैं, जबकि 17 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने कहा कि आस-पड़ोस के लोग अषिक्षित है। 85 प्रतिषत उत्तरदाताओं के आस-पड़ोस के लोग पढाई के लिए प्रात्साहित करते है। 85 प्रतिषत उत्तरदाओं के आस-पड़ोस वाले लोग उनकी समस्या का समाधान करते हैं। 100प्रतिषत उत्तरदाताओं का कहना है,कि महिलाओं को षिक्षित होना चाहिए, क्योंकि इससे घर-परिवार में षिक्षा के प्रति जागरूकता आती है। अतः परिकल्पना अस्वीकृत होती हैेे।

 

4. अध्ययन के निष्कर्ष से प्राप्त होता है, उपरोक्त सारणी से यह स्पष्ट होता है,कि 100 प्रतिषत उत्तरदाताओं में से 99 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने उत्तर दिया कि कैदियों को षिक्षा देनी चाहिए। 100 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने माना कि कैदियों को रोजगार के सामान्य अवसर प्रदान करनी चाहिए। 98 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने माना कि कैदियों केा रोजगार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। 100 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने माना कि महिलाओं को भी रेाजगार करना चाहिए अतः परिकल्पना स्वीकृत होती हैेे।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:-

·      .वी. भटनागर - ‘‘अधिगमकर्Ÿाा का विकास एवं षिक्षण अधिगम प्रक्रिया’’, आर. लाल बुक डिपो, मेरठ

·      सिंह, डाॅ0 श्यामधर - अपराध षासन के सिद्धांत

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Received on 10.09.2020            Modified on 16.10.2020

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Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):219-225.